﻿<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?><rss version="2.0"><channel><title>जयगुरूदेव समाचार</title><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/RSS.aspx</link><description>This will not shown in the page.</description><copyright>© 2012 Jaigurudev Ashram. All Rights Reserved.</copyright><ttl>180</ttl><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; प्राप्त सूचना के अनुसार बाबा जयगुरूदेव जी महाराज का काफिला महाराष्ट्र में आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है और जनता बाबाजी के दर्शन के लिए, आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से पड़ाव स्थल पर पहुंच रही है। सभी वर्ग के लोग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर बाबाजी के पास पहुंचना चाहते हैं। चाहे बीमारी, प्रेतबाधा, विवाह, नौकरी, झगड़ें अथवा अन्य बातों की समस्याओं को लेकर पहुंच रहे हैं। राजनीतिज्ञों की अपनी समस्या है। कुर्सी बनी रहे अथवा मिल जाए। सब अजीबों-गरीब दृश्य बाबाजी के पास देखने को मिल रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने कहा कि-&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic; color: rgb(170, 0, 170);"&gt;‘बिन हरी भजन न जाहिं कलेशा।’&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;शाकाहारी हो जाओ। जीव हत्या की कोई माफी नहीं। ऐसे लोगों के लिए नर्क का रास्ता खुला है। बात मानने से महात्माओं की दया से ही बचाव संभव है वर्ना कुदरत अब तैयार खड़ी है और कभी भी विनाश जैसा नजारा देखने को मिल सकता है तुम जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;परजा बहुत मरेगी जग,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;लाशें पड़ी सड़ेंगी घर-घर में&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;उठाने वाले मिलेंगे न यार&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;कह गए जयगुरूदेव पुकार&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;जमाना बदलेगा।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;करीब चालीस वर्ष पर्व लखनऊ के मुख्य बाजार हजरतगंज के गांधी पार्क में बाबाजी के प्रेमी गाकर इस प्रार्थना को जनता के बीच सुना रहे थे। बड़ी भीड़ लग गई थी और उधर बाबाजी बाजार में टहलते हुए इस अजीबों-गरीब दृश्य को देख रहे थे। उन दिनों को याद करते हुए बाबाजी के एक प्रेमी लखनऊ के सत्संगी ने एक शायर की दो पंक्तियां तरन्नुम के साथ सुनाईः-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(170, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;वो दिन जब याद आते हैं कलेजा मुंह को आता है।’’&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 85); font-weight: bold;"&gt;अपना साधन (गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;परमात्मा परिपूर्ण है। उसकी आवाज परिपूर्ण सर्व ब्रह्माण्ड में समाई हुई है। जिस सूर्य का प्रकाश सब जगह परिपूर्ण है, बादल आने पर चाहे प्रकाश ढक जाता परन्तु प्रकाश लोप नहीं हुआ है। प्रकाश तो सूर्य का रात्रि में भी है सिर्फ पर्दा&amp;nbsp; आ गया है। इस वजह से अंधेरा हो गया है। जिस तरह रेडियो व वायरलैस काम करता है अमेरिका, इंग्लैण्ड, रूस, जापान, पाकिस्तान आदि देशोें के हवाले होकर आवाज पहुंचाई जाती है। लोगों को मालूम नहीं है कि हवा क्या है। हवा परिपर्ण एकरस सब जगह है। इसी तरह परमात्मा की चैतन्य धार जो प्रकाश रूप है बस जगह परिपूर्ण है। जूंही बात की और फौरन आवाज पहंुच जाती है। दुनियां का विज्ञान इसी जगह तक रहता है और यहीं खत्म हो जाता है। यह बुद्धि विज्ञान है। इसके परे आत्म विज्ञान है और ईश्वरीय विज्ञान है। महात्माजन समूचे ब्रह्माण्ड में बात करते हैं। यदि तुम्हें सारे विश्व के विज्ञान का अनुभव करना है तो तुम महात्माओं के पास पहुंचो और उनके पास पहुंचकर दैविक पराविज्ञान जानने की कोशिश करो। जिस तरह हवा सर्व व्यापी होती है उसी तरह महात्मा सर्व व्यापी होते हैं। जिस तरह हवा में होकर सारे स्टेशनों से तुम्हारे स्टेशन तक आवाज आती है उसी तरह से महान आत्मायें एक जगह से दूसरी जगह तक बात कर लेती हैं। जिस तरह से हम एक दूसरे आदमी से बात करते हैं उसी तरह महात्मा परमात्मा के साथ बैठकर बात करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;यह रहस्य रघुनाथकर वेगि न जाने कोय, जो जाने सो हरी कृपा, सपनेहु मोंह न होय।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;यह रहस्य प्रभु का है। इसको कोई जानता नहीं है। महात्मा भली भांति जानते हैं क्योंकि आत्म सांइस को गुरू के पास पहंुचकर साधन द्वारा जान लिया है और आपको भी गुरू द्वारा जानना होगा। बगैर गुरू के आत्म सांइस जाना असंभव है। आत्म सांइस को प्राप्त करने के लिए गुरू के स्कूल में आपको भर्ती होना और गुरू रजिस्टर में नाम लिखाना होगा तब वो आपको शांत और सुखदायी विद्या देंगे। बगैर गुरू के आपको आत्म पराविद्या प्राप्त नहीं होगी।-क्रमशः&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भारत के मध्यभाग उत्तर प्रदेश से युग परिवर्तन होता आया है चाहे उत्तर प्रदेश की अयोध्या हो या मथुरा और यह महात्माओं की भूमि है। बाबाजी ने कहा है कि कलयुग जाने को तैयार है और सतयुग आने के लिए बेताब है। दोनों की टक्कर में बीसों करोड़ लोग साफ हो जायेंगे। अब लड़ाई महाभारत की तरह अटठारह दिनों की नहीं होगी और बटन की लड़ाई होगी और चन्द मिनट का खेल होगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं और सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं क्योंकि वर्चस्व की लड़ाई है। कहा गया है कि-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;मेरे मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने कहा कि-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;महाबली एक शासक होगा,&lt;br&gt;धर्म मुकुट सिर पर धारेगा&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;धरा से देगा पाप हटाए, &lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;जयगुरूदेव की वाणि&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;बाबाजी ने यह भी कहा है कि- भविष्य में देश का नेतृत्व शाकाहारी लोगों के हाथों में होगा। देश में इतन सुधार होगा, इतनी समृद्धी होगी जिसे अप सोच भी नहीं सकते। सदाचार आएगा, सत्यवादी लोग होंगे, धार्मिक होंगे। यह हवा यानी सभी देवता सहायता करेंगे। यह बीच का समय दिल्ली वालों के लिए, आप सबके लिए बहुत नाजुक आया है। इसमें बहुत सावधानी से, समझ-बूझकर चलना है। बाबाजी की बातों को आपने समझ लिया तो यह समय पार हो जाएगा। आप सब लोग अपना-अपना काम करें और अपने-अपने भजन-पूजा, इबादत, पाठ-पार्थना में लगे रहें। महात्माओं की शिक्षा छोड़ने से लाखों बुराई आ गईं। अब महात्माओं के संपर्क की आवश्यकता है। उनका सहाया मिलने से ही सुधार होगा। आप समय दीजिए बड़े-बड़े अनुभव आपको होंगे। जो भी काम होगा वह आपको फायदे का होगा। बाबाजी सबके लिए, सबके हित की और अच्छी बातें कहते हैं।

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1266</link><pubDate>Mon, 06 Feb 2012 10:46:52 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बाबा जयगुरूदेव जी महाराज अपने काफिले के साथ 19 दिसम्बर 2011 को मथुरा आश्रम से चलकर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में जगह-जगह होते हुए और सत्संग व परमात्मा की प्राप्ति का रास्ता (नामदान) देते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि 15-20 दिन तुम लगकर साधना करो तो जीवात्मा की आंख यानी तीसरी आंख खुल जाएगी और तुम्हें परमात्मा-खुदा का दर्शन-दीदार होगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी पुनः महाराष्ट्र में लौट आए हैं और आज नागपुर में सत्संग करने के बाद अमरावती में अपने काफिले के साथ पहुंच गए हैं। प्राप्त सूचना के अनुसार चार स्थानों में सत्संग करने की मौज बाबाजी कर सकते हैं। 6 से10 मार्च तक होली का सत्संग कार्यक्रम मथुरा में होगा। इसके पहले काफिला लेकर बाबाजी मथुरा आ जायेंगे ऐसी सूचना है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;प्रेमियों से बाबाजी ने कहा कि परमार्थ के रास्ते पर चलने के लिए सादगी का होना आवश्यक है। आत्म अनुभव सादगी में होता है। जिन सत्संगियों का मन साधन-भजन में नहीं लगता है और व्यर्थ के पचड़े किया करते हैं वे अपना समय बर्बाद करते हैं। वो अपना नुकसान करते ही हैं दूसरों का भी नुकसान करते हैं। अपना लक्ष्य परमार्थ का बनाओ और बाकी सबकुछ सतगुरू की मौज पर छोड़ दो तो सत्संगी की संभाल बराबर होती रहेगी।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255); font-weight: bold;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold;"&gt;(गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं एक दफा सिनेमा देखने एक गुरू भाई के साथ बम्बई में गया हुआ था। हालांकि मैंन पूरा पिक्चर देखा ही नहीं और जब मैं वापस आया और अपने कमरे में बैठकर सुमिरन करने लगा तो हमारा चित्त बजाय सुमिरन के वह तस्वीर देखता था जो सनीमा में देखा था। कई महीनों के बाद वह तस्वीर दृष्टिगोचर से दूर हुई। जबकि मैंने बहुत कोशिश किया और लगातार साधन और गुरू का सत्संग करता रहा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जो महात्माओं के सत्संग में आ जाते हैं और मालिक की महिमा अथवा अपने आत्म कल्याण के लिए जरूरी सबक सुनते हैं उनको चाहिए कि अपने आत्म निरूपण के हेतु जतन करें वर्ना समय निकल जाएगा फिर अपना काम न होगा। सत्संगी गुरू के उपदेश को ग्रहण करते हैं और हित चित्त को सुनते हैं उनको हमेशा अपने मित्रों से बचकर रहना जरूरी होगा। जो सत्संगी अपने मित्र के साथ सिनेमा किसी मोहब्बत में आकर चले जाते हैं और वहां जाकर देखते हैं उनका साधन बिलकुल चैपट हो जाता है और गुरू के शब्दों को भी भूलने लगते हैं। इन्हीं क्रियाओं से साधन करने वालों का मन बिलकुल गंदा हो जाता है और कुछ ही समय के अन्दर गुरू की संगत से दूर हो जाते हैं। सत्संगी का मन जब बिलकुल गंदा हो जाता है और फिर समय के अनुसार कुकर्म करने लगते हैं। संग के दोष से लोग मांस खाने वालों के हाथ का खाते और पीते हैं। हम जानते हैं कि यह आदमी महा व्याभिचारी है उसके घर जाकर दावत शौक से जाते हैं और उनके यहां सोते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;परमार्थीयों ! अगर तुम अपना साधन करना चाहते हो और तुम्हें आत्म कल्याण की चाह यदि है तो तुम इन मांस खाने वालों से सदा दूर रहो। इनकी संगत से तुम निश्चय चैरासी चले जाओगे। मांस-शराब पीने-खाने वाले बुद्धिहीन मनुष्य परनारियों के जीवन को अपश्य नष्ट कर देते हैं। क्योंकि मांस और शराब का यही गुण है। मैं देखता हूं कि सांइस बहुत तरक्की कर रही है। इस साइंस को देखकर लोग हैरान हैं। परन्तु हम जब विचार करते हैं कि यह आत्म साइंस है तो समझने लगते हैं कि कुछ भी तरक्की इस साइंस ने नहीं की है।&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 0, 170);"&gt;-क्रमशः&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;खबरें देश-दुनियां सेः-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;महात्माओं ने कहा है किः-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 85);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;जाको विधि दारूण दुख देहिं, ताकी मति पहले हर लेहीं।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;भारत की राजनीति में यही दृश्य आज देखने को मिल रहा है और जनता के बीच यह विषय चर्चा का विषय बना हुआ है। इन्तजार तो लोग कर रहे हैं कि आज कुछ होगा, कल कुछ होगा। इसी आस में सब अटके हुए हैं। यह भी कहा गया है किः-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;पुरूष बली नहीं होत है समय होत बलवान।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;राम का वरदान है तो समय की प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी। बाबाजी के शब्दों में &lt;span style="color: rgb(85, 0, 85);"&gt;‘‘राम ने वक्त का इन्तजार किया, कृष्ण ने भी वक्त का इन्तजार किया और मैं भी वक्त का इन्तजार कर रहा हूं।&lt;/span&gt;

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1265</link><pubDate>Sun, 05 Feb 2012 09:40:31 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; प्राप्त सूचना के अनुसार आज प्रातः हींगनघाट में प्रातः अपना संदेष सुनाने के बाद बाबा जयगुरूदेव जी महाराज नागपुर पहुंच गए जहां वे जनता को अपना सत्संग संदेष कल 5 फरवरी को सुनायेंगे। कुछ लोगों के प्रष्नों का उत्तर देते हुए बाबाजी ने कहा कि जब तक लोग मांस, शराब आदि नशीली चीजों का सेवन बन्द नहीं करेंगे, शाकाहारी नहीं हो जायेंगे तब तक उन्हें सुख ओर शान्ति नहीं मिलेगी।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बाबाजी ने कहा कि देश में धर्म का आना जरूरी है और धर्म को अपनाकर आध्यात्मवाद के रास्ते पर लोग चलेंगे ऐसा पिछले महात्माओं ने कहा है। जो नहीं चलेंगे उनको कुदरत माफ नहीं करेगी। उसके यहां देर है पर अंधेर नहीं है। मैंने पहले सब कुछ कह रखा है। परिवर्तन तो होगा ही इसे कोई रोक नहीं सकता। रात में कुछ और सवेरे कुछ और नजारा दिखाई देगा। याद रखिए कि अब-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(255, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;‘बिनु हरिभजन न जाहिं कलेशा।’&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 0);"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span style="color: rgb(170, 0, 170);"&gt;अपना साधन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब लोग इस महासुख का अनुभव जो उनके अन्दर छिपा हुआ है नहीं सुनना चाहते हैं तो मैं चुप हो जाता हूं और मेरा भाव संसार की तरफ से&amp;nbsp; उदासीन हो जाता है। मौन अवस्था में वही काम दिखाने का करता हूं जो संसार करता है। संसार के देखने में वह काम करता हुआ नजर आता हूं। परन्तु मैं संसारी कार्य किंचित मात्र नहीं करता हूं। संसार को जगाने के लिए उनके पास पहुंचकर महासुख का अनुभव कराता हूं और कराना चाहता हूं। इसी बीच में हमको लोग संसारी समझते हैं। मैं किसी की स्त्री के साथ बात करता हूं तो लोग मुझे यह समझते हैं कि मैं संसारी हूं। सच तो यह है कि मैं संसारी नहीं हूं। मैं उनको माता-बहन की भांति देखता रहता हूं और सुरतें जो इस तन में तमोगुण के साथ सो रही हैं, मोंह के वशिभूत हैं उनको जगाता रहता हूं।&amp;nbsp; मेरे पास आए हुए स्त्री-पुरूष अपना अनुभव करते हैं परन्तु मैं अपनी कोशिश परोपकार हेतु करता रहता हूं।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं गुरू से सुना करता था संत संतगुरू, समदर्शी, अतंर्यामी, सर्वव्यापी अर्थात सब कुछ जानते रहते हैं। मैं एक दिन अपने प्रेमी के पास खड़ा था। वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश में था और साथ उसकी स्त्री भी बुरे कर्म में थी। मैं तीन दिन के बाद उस प्रेमी के पास गया और कहा कि-तुम उसे दिन दूसरे को नुकसान पहुंचाने की बात करते थे। ऊपर के दिखावे वाले प्रेमी ने मुझे साफ इन्कार कर दिया। कहा कि मैं नुकसान पहुंचाने की नहीं सोच रहा था। बाद में मैंने स्त्री को सख्त शब्द से पूछा तो डरकर कहने लगी कि-आपकी बात सत्य है। आपने इतनी दूर से जान लिया। आज मुझको विश्वास हुआ कि महात्मा सब जानते हैं पर आदमी ने स्वीकार तब किया जब उसकी स्त्री ने बहुत समझाया। तब उसे अपनी असत्यता पर बहुत पछतावा हुआ और बाद में पछतावा करने लगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(170, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;पहले पाप कमाय कर, विष की बांधी पोट।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;कोटि कर्म पर्दे कटें जब आवें गुरू ओट।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बुरी भली खोटी खरी गुरू आगे सब खोल,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मन की तेरी सब जानें, कहां छिपावे अंध।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;सतगुरू जानकार हैं। वह ऊंची मंजिल पर बैठे हैं जहां से गुरू सबकुछ देखते हैं। जब मैं साधन करता था तो गुरू महाराज ऊंचे मण्डल पर ले गए जहां से सारी दुनियां अपने आप सब दिखाई दे रही थी। गुरू ने कहा कि यह स्थान है जहां से लोगों को देखते हैं कि संसार के लोग क्या करते हैं सारी दुनियां पाप की तरफ हो गई है। मालूम होता है कि चिकनी चट्टान है और टेड़ी है। जैसे ही पैर पड़ता है कि लोग फिसल&amp;nbsp; जाते हैं। गुरू तुम्हारे कर्म को देखता है। पाप सर्वदा रहता है तुम चाहे कितना पापकर्म करो। एक दफा वह शक्ति आगाह करेगी जरूर। तुम आदत के गुलाम होकर अपने आप बिक चुके हो और इसी आदत से अकर्म कर डालते हो।&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 0, 170);"&gt;-क्रमशः&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;बाबा जयगुरूदेव जी ने 36 वर्ष पूर्व कानपुर के फूलबाग के मैदान में बीस लाख जनता के बीच 32 फीट ऊंचे मंच से 23 जनवरी 1975 को सुभाष जयन्ती के अवसर पर ललकारते हुए कहा था कि-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(170, 0, 85);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भारत के वीर जवानों जागे&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जनता तुम्हें पुकारती&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;दुख में तुम्हें पुकारती&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जनता जगने वाली है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बच्चे आने वाले हैं&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;न्यायअली के बच्चों में&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कुछ खटपट मचने वाला है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;झूठ न छिपने वाला है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भंडा फूटने वाला है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;वक्त बदलने वाला है।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;भारत में फैले भ्रष्टतंत्र की कहानी लिखी जा रही है। इतिहास&amp;nbsp; बन रहा है। आम धारणा बन गई है कि लोकतंत्र भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। मूक रहे राष्ट्रपति की भी चर्चा हो रही है कि अब उन्हें अपने अधिकार का प्रयोग करना चाहिए जिससे जनता को सुकून मिले।

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1264</link><pubDate>Sat, 04 Feb 2012 08:48:55 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कल मेडीचाल (हैदराबाद) में सत्संग एवं नामदान के बाद बाबा जयगुरूदेव जी महाराज अपने काफिले के साथ डिच्चपल्ली पहंुच गए जहां रात्री विश्राम हुआ। प्राप्त सूचना के अनुसार आज प्रातः सत्संग एवं नामदान देने के बाद आंध्रप्रदेष की सीमा पार करके महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगणघाट में रात्री विश्राम होगा और कल प्रातः सत्संग व नामदान की मौज के पश्चात बाबाजी अपने काफिले के साथ नागपुर जाने की मौज में हैं।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने कहा कि इस मनुष्य शरीर की कोई कीमत नहीं, अनमोल है। पांच तत्वों के इस जड़ शरीर में जीवात्मा दोनों आंखों के पीछे बैठी है। वो चेतन है और शरीर चला रही है। उसके निकल जाने से शरीर निर्जीव हो जाता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इसको घेरकर बैठे हैं ताकी यह आजाद न होने पावे।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जीवात्मा एक-एक करके चार शरीरों में बन्द है। पहला यह स्थूल मनुष्य शरीर दूसरा लिंग शरीर जिसमें देवी-देवता हैं, तीसरा सूक्ष्म शरीर जिसमें ईश्वर, खुदा, गाॅड हैं। चैथा कारण शरीर। साधना के द्वारा इन चारों शरीरों से जब निकलकर जीवात्मा अलग होती है तब इसे होश आती है कि वो कितने बड़ी शक्ति है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मन और बुद्धि दोनों सीमित हैं और उनके द्वारा जीवन की समस्या हल नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि जब तब हम आंखों के नीचे बैठे हैं तब तक इन समस्याओं को साफ-साफ नहीं समझ सकते हैं और अंधेरे में ठोकरें खाते हैं। संतमत हमें इन समस्याओं को हल करने के लिए शब्द रूपी कुंजी देता है। अन्दर में तरक्की के हर एक कदम के साथ नए अनुभव होते हैं और जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी बदलता जाता है। अन्य सृष्टि मे मनुष्य कुछ प्रकाश देखना शुरू करता है और ब्रह्माण्ड को पार करने के बाद आत्मा के सब खोल उतर जाते हैं और आत्मा नंगी हो जाती है, अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाती है। सचखण्ड से वो कैसे आई जानने योग्य हो जाती है। वहां पहुंचकर वो अनुभव करती है कि परमात्मा असीमित है, ज्योति है और सभी जीवों का जीवन है। सब खेल उसी का है और सबमें उसका नूर है। सर्वशक्तिमान प्रभु शब्द और आत्मा सभी एक ही सारवस्तु हैं। सर्वशक्तिमान प्रभु चेतना और परम सुख के सागर हैं। शब्द उस सागर की एक लहर है और आत्मा उस लहर की एक बूंद है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 255);"&gt;(गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं अपना साधन बता रहा हूं। जब कभी मांसाहारी जीव के शरीर से स्पर्श किया हुआ भोजन मिल जाता है उस दिन साधन में कटे हुए बकरे, सूअर, मुर्गी, सांप, गोजर, बिच्छू, मगर, शेर, कुत्ता नजर आते हैं और ये सब चिल्लाते हैं। सांप काटने को दौड़ते हैं और बिच्छू डंक मारते हैं। मालूम होता है कि मैं किसी महादुखी बला में फंस गया हूं। जब जोर देकर साधना करता हूं और कसूरों की माफी मांगता हंू और रोता-जूझता हूं, संसार से उदासी आती है तब कहीं जाकर चैन आता है और आंखों का परदा साफ होता है। जिसके घर वाले गोश्त खाते होंगे और उसका संपर्क उन मांस खाने वालों से होगा वह साधन कदापि न कर सकेगा। सदा उसकी बुद्धि डांवाडोल रहेगी। ऐसे आदमी अपना समय पशुओं की तरह गुजार देते हैं। अपना अनुभव साधको को सुना रहा हूं। तुम परमात्मा के निकट पहुंचना चाहते हो तो मुर्दाखोरों से अपना संपर्क कम कर दो। जो पिता अपने बच्चों को गोश्तखोर बना देता है और किसी कमजोरी की वजह से अपने बच्चों को मना नहीं करता है वह भी पाप में जावेगा और आत्मा अघोर नर्कवासी होगी।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जो स्त्री अपने पती को पापकर्म से नहीं रोकती है वह भी पाप में गिरेगी। स्त्री का धर्म है कि अपने पती को कुमार्ग से यानी शराब, मांस, आदि व्यसनों से बचा ले और उसे सतमार्ग में लगा दे। स्त्रीयां चाहें तो आदमी को बन्दर की तरह नचाकर सुमार्ग में ला सकती हैं। आदमी की कोई हस्ती नहीं है जो स्त्री के विपरीत जावे। स्त्री को थोड़ा अनुभव करना होगा। स्त्री खुद गुरूभक्त जावे। स्त्रीयों को चाहिए कि अपने पती के साथ कड़ा अनुभव करे और अनुभव के ही द्वारा तुम इन्हंे ठीक कर सकती हो।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;पुरूष मन, इन्द्री के वशीभूत होकर परनारियों की ओर कुदृष्टी से देखते हैं और अपना जीवन नष्ट कर देते हैं। तुम्हारी दशा शोचनीय हो जाती है। बाद में तुम अपने पति से हाथ धो बैठती हो। दुख का सागर अपने वास्ते हो जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;इसी वजह से महात्माओं के समीप आकर सुचरित्रता से नहीं चलते हैं और जो साधन गुरू बताते हैं उनमें उनका मन जरा भी नहीं लगता है। सदा संसारी प्रपंच में लगे रहते हैं। मन को विषयों की तरफ से रोकते ही नहीं है। महा अज्ञानता का नशा पी रखा है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब मेरा मन गुरू शब्द को भूलता उस वक्त संसार के सामान की एक लहर मन में आती थी और जब मैं गुरू शब्दों को याद करता था तो संसार के हर सामान से उदासी हुआ करती थी और भजन में मन लगता था। परन्तु जब मैं साधन करते-करते अपने आप साधन में पहुंच जाता था तो बहुत सी साफ धुनियां सुनाई पड़ती थीं और प्रकाश तो बादलों की तरह चलकर आता था और उसके बीच में हो जाता था जैसे मानों अपने आपको चारों ओर से डक गया। महा आनन्द के सुख का अनुभव करता था। ऐसा सुख है जिसे किससे कहुं। सारी दुनियां के लोग इस सुख से महरूम अर्थात वंचित हैं और न उनको इस सुख की प्राप्ति होगी। मैं जब कभी इस सुख का वर्णन करता हूं पागल की सी अवस्था में तो लोग समझते हैं कि महात्मा मूर्ख हैं और ये पागलों की सी बात करते हैं।A

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1263</link><pubDate>Fri, 03 Feb 2012 11:07:06 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कृष्ण भगवान की नगरी वृन्दावन में पिछले रविवार को एक साधू सड़क पर गा रहा था कि-क्या होगा कौन से पल में कोई&amp;nbsp; जाने न। उसी समय बिहार के एक पत्रकार परिवार सहित भगवान का दर्शन करके मन्दिर से बाहर निकले थे। उन्होंने जब साधू की मस्ती को देखा और गीत को सुना तो अपने को न रोक सके और गुनगुनाने लगे-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इन्सान।’’&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;हैदराबाद में बाबाजी के उपदेशों को जगह-जगह सुनकर हिन्दू-मुसलमान दर्शन-दीदार के लिए दौड़ने लगे हैं। मुसलमान भाई अपनी किताबों का जिक्र करते हुए कहने लगे हैं कि उनमंे लिखा है कि-चैहदवीं सदी के आखीर में एक फकीर खुदा का पैगाम लेकर जमीं पर उतरेगा और सभी इन्सानों को सुनायेगा। प्राप्त सूचना के अनुसार बाबा जयगुरूदेव जी महाराज हैदाराबाद के मेडचाल स्थान पर आज कार्यक्रम कर सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255); font-weight: bold;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold;"&gt;अपना साधन (गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बहुत से लोग मांस-शराब खाते-पीते हैं और जीव हिंसा से उनके मन में घृणा नहीं हुई है, बहुत ही अपराधी हैं, महापाप सिर पर लदा हुआ है। ऐसे लोग सत्संग में आकर दूसरों का मन खराब करते हैं। सत्संगी जनों! यदि तुम्हें प्रभु का पाना है तो दुश्भाव वाले मनुष्यों का संग कदापि न करो। जो लोग संतमत के सत्संगी हैं उनके खास नजदीकी लोग मांस-शराब खाते-पीते हैं और उन्हीं के हाथ का खाते-पीते हैं, उनको अपना अजीज समझते हैं वह तुम्हारे अजीज नहीं है। वह अपनी इच्छा के वशिभूत होकर यह कर्म करते हैं और तुम्हारा लोक-परलोक नष्ट किए देते हैं। आप खुद अपनी करनी का फल भोगेंगे और दूसरों को भी भुगतावेंगे। ऐसे जीवों को महात्माओं ने महाअज्ञानी, मूढ़ वर्णन किया है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;कुमतिहीन हुए मन मूरख, बार-बार नरकें जावें।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;इनकी संगत का असर बुरा होता है। हमें भी दुखदाई योनि में जाना होगा। साधन करने वाले साधकों को अपना साधन सुना रहा हूं ताकि कोई सत्संग अपना सुलभ परलोक का रास्ता तय करना चाहे तो मांसाहारी जीवों से लाखों कोस दूर रहे। शरीक होने वाले अर्थात अर्शपर्श करने वाले दोनों को पाप लग जाता है। नर्क नीचे चैरासी योनी में अपना कर्म भोगना होगा।

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1262</link><pubDate>Thu, 02 Feb 2012 03:16:10 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आज हैदराबाद में बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने सत्संग किया और लोगों को नामदान भी दिया। सिकन्दराबाद में काफी संख्या में हिन्दू-मुसलमान भाईयों ने सत्संग में भाग लिया। अन्तराष्ट्रीय स्तर के पत्रकार जब बाबाजी की फोटो लेने लगे तो स्वामी जी ने कहा कि फोटो लेने से क्या होता है ? ठीक है आप बैठकर सुनिए और समझिये तो ठीक है। आप भीड़ देख रहे हैं। अगर मैं तीन-चार दिन यहां रूक जाऊँ तो इस मैदान में नजारा कुछ और दिखाई देगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने कहा कि-‘दुनियां में तमाम लोग महात्माओं के सानिध्य में अपना नैतिक स्तर, नैतिक चरित्र सब उठा सकते हैं। जब तक वे महात्मा दुनियां में प्रेम करने वाले नहीं आते तब तक हमारा चरित्रबल स्त्री और पुरूषों का नहीं उठ सकता। इसलिए आज के युग में महात्माओं की विशेष जरूरत और आवश्यकता है। जिन लोगों ने महात्माओं को आगे से पीछे कर दिया मौजूदा समय में इसकी जरूरत नहीं समझी, इसलिए वह समाज और वह धर्म और वह जाति अपने चरित्रों से नीचे गिर गई। जिस धर्म के लोग गिर गए, जिस कर्म से लोग गिर गए मनुष्यमात्र सभी गिर गए तो अब हमारे पास क्या रह गया ? हम झूठ भी बोलते हैं क्योंकि हमारा चरित्र गिर गया। हम धोखा भी देते हैं, हम दूसरों की निन्दा भी करते हैं, हम दूसरों की बहू-बेटियों की तरफ कुदृष्टी से देखते हैं क्योंकि हमारा चरित्र गिर गया। हम विषय-विकारों में, विषय-विकारों की लपेट में, विषय-विकारों के शिकार बने रहते हैं। क्योंकि हमारा चरित्र गिर गया। जब हम सब प्रकार से गिरे, हमारा हर बात से जब पतन हुआ तो हम अपने आप आज के युग में राजननीतिक विधान के अनुसार उठ नहीं सकते। राजनीतिक विधान में प्रेम का प्रचार नहीं है। राजनीतिक विधान में बन्दोबस्त का प्रचार है। प्रेम का प्रचार नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब प्रेम का प्रचार होता है तो इन्सानों के अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं। जहां बन्दोबस्त का प्रचार होता है और प्रेम का प्रचार समाप्त हो जाता है उस समय पर भोगों के चरित्र गिरते हैं और मनुष्य इतना गिर जाते हैं कि अपने परिवार से, अपने कुटुम्बियों से, अपने भाईयों से, अपने बच्चों से, अपनी स्त्री से, अपनी बेटियों से, अपनी बहनों से इतने तंग आ जाते हैं, इतने परेशान हो जाते हैं, इतना आतंक छा जाता है कि हमारा जीवन क्लेशमय हो जाता है। आज के इस युग में बन्दोबस्त का प्रचार अधिकांश में हमारे इस वातावरण में और समय में हुआ। प्रेम का प्रचार समाप्त कर दिया गया। यही कारण है कि गृहयुद्ध हो गया, हर घर में युद्ध हो गया। कोई ऐसा घर, कोई ऐसा परिवार नहीं है जो अपने परिवार के आदमी से दुखी न हो। हर परिवार में गृहयुद्ध। एक तो समाज युद्ध होता है। पहले गृहयुद्ध हुआ उसके बाद समाज युद्ध हुआ उसके बाद राजयुद्ध हो गया। राज के नियमों का उल्लंघन, समाज के नियमों का उल्लंघन, देश के नियमों का उल्लंघन हो गया। इस तरह से इसका नाम हो गया &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;‘‘गृहयुद्ध’’&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 170); font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;अपना साधन (गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मन जब निरंजन स्वरूप में आ जाता है तो इसमें देविक, देवताओं की शक्ति आ जाती है। यही मन संसार भोगों का रस लेता था, यही मन अब दैविक होकर देवता कहलाता है। मन के नशे को गुरू नीचे उतारते हैं वरना मन का नशा उतरना बहुत कठिन है। यदि गुरू अपना अंकुश न रखें तब तो यह बहुत कुछ कर सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;दुनियां की ताकतें जो काम करती हैं उनके ऊपर यदि किया दूसरे का अंकुश न रहे तो न मालूम क्या करे और कभी-कभी कर बैठते हैं। इसी तरह हमारा मन आजाद हो जाए तो फिर इस मन को निराली मस्ती चढ़ती है। मन अपनी तुरंग घोड़ी पर सवार होता और दौड़ता फिरता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;एक दफै का जिक्र है कि एक आदमी का भोजन किया। भोजन करने के उपरांत हमारा मन खराब&amp;nbsp; हो गया। उस वक्त जो विकारी अं्रग का सरूर चढ़ा समझ लो कि गुरू कहां है और हम कहां है, कौन देखता है- इस प्रकार के भाव प्रकट हो जाते हैं। साधकों! मन की मलीनता का ही संसार बना हुआ है। जब तक तुम सतगुरू के चरणों में रहकर इसकी धुलाई न करोगे तब तक मन का मैल उतरना कठिन है। जब मैं गुरू के पास गया तब जाकर भोजन का विकार दूर हुआ। वरना बुद्धि नष्ट हो गई थी। दूसरों के यहां भोजन करने से मन और बुद्धि अथवा इन्द्रियों पर खराब असर होता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;पाप आत्माओं के शरीर स्पर्श किए हुए अन्न में महान जहरीला जहर होता है जोकि धीरे-धीरे असर करता है और सारे बदन में फैल जाता है। कुछ ही दिन में हमारी आत्मा पाप आत्मा हो जाती है और शरीर भी पापी हो जाता है। एक आदमी मांस खाया करता था। मुझे मालूम नहीं हुआ था। देखने में वह आदमी पूजा बहुत करता था परन्तु जीव हत्या उस आदमी को लगी थी। मैंने भोजन किया तो एकाएक साधन करने में सूखापन आ गया और जो साधन में उपलब्ध किया था वह भी हमारा गायब हो गया और मेरी हालत पागलों की सी हो गई।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं पागल अवस्था में क्या करता। क्यों करती बुद्धि हमारी नष्ट हो चुकी थी। मैं किसी से कुछ कह भी नहीं सकता था। एक सत्संगी ने आकर पूछा कि तुम्हें क्या हो गया ? मालूम होता है कि तुम्हें पागलपन का नशा चढ़ गया है। सत्संगी ने अपना भाई समझकर कहा कि-आप गुरू के पास जायें और प्रार्थना करें कि ‘हे गुरू आप हमारी बुद्धि शुद्ध कर दें और अपने चरण की दात बख्शें।’ सत्संगी के अन्दर गुरू ने महान प्रेरणा की और सद्बुद्धि दी और मैं गुरू के पास पहुंच गया।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;गुरू के पास पहंुचते ही गुरू ने कहा कि आज ज्यादा बोझा लादकर आए हो। खैर आ गए। मैंने तुम्हें इशारतन कई दफा समझाया था पर तुम्हंे उसका ध्यान नहीं हुआ। आगे जब खाना तब मालूम कर लेना कि भोजन कैसे का है। इसी वास्ते अपनी कमाई का भोजन फायदेमन्द होता है। आप खुद खाओ और दूसरों को खिलाओगे तो दोनों का फायदा होगा। देने वाले और खाने वाले का फायदा होता है।-&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 0, 85);"&gt;क्रमशः&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;समाचार देश-विदेश से&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;उच्च न्यायालय ने कहा कि भ्रष्टाचार हमारे देश में न सिर्फ संविधानिक शासन के लिए खतरा बन गया है अपितु लोकतंत्र और कानून के शासन की बुनियाद के लिए भी नुकसानदेह बन चुका है।-न्यायमूर्ती ए.के. गांगूली

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1261</link><pubDate>Thu, 02 Feb 2012 02:54:03 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; परम पूज्य बाबा जयगुरूदेव जी महाराज अपने काफिले के साथ हैदराबाद में हैं और उनके पड़ाव स्थल पर वहां के स्थानीय निवासियों का तांता बराबर लगा हुआ है। वे बाबाजी को अपने-अपने दुखड़े सुनाना चाहते हैं व आए हुए फकीर साहब के दर्षन-दीदार करना चाहते हैं। कल सिकन्दराबाद में सत्संग है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने कहा कि-‘यह जमीन फकीरों-महात्माओं से कभी खाली नहीं होती। महान शक्तियां इस भूमण्डल पर हमेशा रहा करती हैं। जब वो देखती हैं कि तुम अपने रास्ते को भूलकर भटक गए और इधर-उधर चले गए तब सामने आकर आवाज लगाती हैं। रूह, जीवात्मा सबमें है। उसके ऊपर कूड़ा-कचड़ा इकट्ठा हो गया है। महात्मा दया से उस कूड़े-कचड़े को हटा देते हैं। जैसे आग के ऊपर राख जमीं रहती है, राख हटा दो तो आग धधक उठती है। इसी तरह से आग जब धधकने लगती है फिर वहीं शुद्ध प्रेम, सेवा, सत्य, ज्ञान, रहम जाग जाता है। मालिक को कौन याद करता है?&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;वही याद करता है जिसको संसार की ठोकरें, जिस्म की, शरीर की आफतें, घर-गृहस्थी के अनेक झंझट घेरे रहते हैं और इन्सान को अन्धकार दिखाई देता है। उस वक्त उसे फकीरों-महात्माओं की झलक चित्त में आती है कि उनका मिलना, दर्शन-दीदार करना जरूरी है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;अपना साधन (गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब गुरू की कृपा से विकारी अंग खत्म हुए तो भजन में मन लग गया। जो गुरू ने कृपा की है वह तो साधक ही समझेगा। जब मैं साधन में बैठता था तो मैं इस बात का विचार रखता था कि मुझे कोई देखे नहीं और गुरू की दया लेता रहूं। जहां तक हुआ लोगों की आंखों को बचाकर साधन करता रहा। मैं जब कभी आंखें बन्द करता और सामने सहज स्वाभाव देखता था तो सिनेमा की तरह दृश्य दिखाई देने लगते हैं। खुले शहर, सुन्दर महल, सुन्दर वाटिकायें, सुन्दर नारियां, सुन्दर पक्षी, सुन्दर देवता आदि नजर आते हैं। जब-जब ज्योति नजर आती है मालूम होता है जिस तरह मन्दिर में घण्टा-शंख धुन स्पष्ट सुनाई देती है और जब उस धुन में प्रवेश होता था तो बोली मालूम होती थी जैसे कि कोई कुछ करता साफ-साफ सुनाई देता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि मैं प्रश्न करता हूं और वह मुझे उत्तर देता है। ज्योति इस स्थान पर नजर आती है, बड़ा दिव्य स्थान मालूम होता है। मालूम पड़ता है कि राज्य क्या चीज है? जड़ के समान इस मृत्यु लोक का है। इतना सुख मालूम होता है कि इस स्थान की ज्योति का अर्थात वहां की रचना को मैं छोड़ना नहीं चाहता। ऐसा मालूम होता है कि गुरू ने शार्टक्ट रास्ते से पहुंचाया है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;अब सुरत में ताकत आने लगी और मन में अहम भाव प्रकट हुआ। एक तरह की मरोड़ पैदा हुई कि मैं कुछ कर दूं। इस स्थान पर मुझे मन की बहुत सी सिद्धियां मानसिक बल की मिलीं और मैंने जो चाहा किया परन्तु जब गुरू को मालूम हुआ उस वक्त गुरू ने बुलाकर बहुत फटकार लगाई और कहा कि यह शक्ति जो दी जाती है इससे केवल परमार्थी लाभ उठाना चाहिए। सहस्र दल कवंल में पहुंचकर अपने स्वाभीमान का अहंकार होता है। मन अपनी ताकत को पाकर कुछ करना चाहता है। जिस तरह से इन्द्रियों में इच्छा होती है कि मैं सारा का सारा भोग भोगूं ज्यादा तादाद में उसी तरह से मन जब अपनी ताकत पा जाता है तो इसे जल्दी होती है कि मैं क्या कर दूं। मन में एक तरह की विकल्प शक्ति है वह आ जाती है। चाहिए यह कि मन उसी रचना में अपना खेल दिखावे परन्तु यहां पर दिखाना चाहता है। पर सत्गुरू सेवक को मन की ताकत से बचाते हैं और चाहते हैं कि मन की शक्ति का प्रयोग किसी संसारी आदमी पर न कर बैठे नहीं तो साधना में बहुत भारी नुकसान होगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;सुरत जब सहस्रदल कवंल में आदिवासी निरंजन भगवान का दर्शन करती है और मन अपने सही रूप में आता है तो मन में वहीं ताकत न्याय की पैदा हो जाती है जो निरंजन भगवान में है। निरंजन भगवान न्यायवान हैं। मन इस स्वरूप का रूप जब बन जाता है तो वह भी चाहता है कि मैं सच्चा न्याय करूं। जैसा जो करता है उसको कसूर के अनुसार सजा दूं। भगवान राम सहस्रदल कवंल से आए थे निरंजन भगवान के हुकुम से। जब श्रीराम चन्द्र जी का मन उन्हीं के स्वरूप में लय हो गया तब उन्होंने कहा-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 255);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; font-style: italic;"&gt;काल रूप मैं तिन्ह कर भ्राता, शुभ और अशुभ कर्मफल दाता।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं जिसका कर्म जैसा देखूंगा वैसा हिसाब करूंगा। इसमें कोई किसी का दुख-सुख देने वाला नहीं। अपने कर्म अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर पाकर कर्म भोगते हैं और किए हुए कर्मों का दण्ड सहन करते हैं।-क्रमशः

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1260</link><pubDate>Tue, 31 Jan 2012 10:08:58 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आज हैदराबाद के घोसा महल में बाबाजी ने सत्संग किया और नामदान दिया।। सत्संग के बाद बाबाजी अपने काफिले के साथ अगले पड़ाव शादनगर चले गए। बाबाजी के दर्शन-दीदार के लिए कल रात से हिन्दू-मुसलमानों का तांता लगा हुआ है। हैदराबाद शहर के अलग-अलग स्थानों पर सत्संग कार्यक्रम निश्चित किए गए हैं जो प्राप्त सूचना के अनुसार इस प्रकार हैं-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 255);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;31 जनवरी शादनगर&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;1 फरवरी रिसाला बाजार&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;2 फरवरी मेडचाल&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;स्थानीय मीडिया ने कार्यक्रम का प्रचार किया और दूरदर्शन ने भी अपना सहयोग दिया। आशा है कि कल हर तबके के लोग बाबाजी के तकरीर सुनने के लिए आयेंगे। वैसे बाबाजी से मुलाकात करने के बाद लोग काफी खुश हैं। बाबाजी की मौज हुई तो कार्यक्रम आगे बढ़ भी सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 170);"&gt;&lt;div style="text-align: left; color: rgb(170, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बाबाजी का लिखित पैगाम&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खुदा के लुत्फ में जहां को भुला दे&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;न तू रहेगा&amp;nbsp; न जहां&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खुदा ही खुदा रहेगा&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खुदी मिटेगी, खुदा मिलेगा&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;चैहदवीं सदी के आखीर में इन्सानों में कोहराम मचेगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उसी वक्त खुदा का पैगाम लेकर एक&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;फकीर ज़मी पर उतरेगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आम इन्सानों, जाति को खुदा का पैगाम सुनायेगा&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हिन्दु-मुसलमान, इसाई फकीर की&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मौहब्बत-कशिश में दौड़ते चले आयेंगे&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जो इन्सान खुदा का पैगाम न सुने उसे खुदा&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;माफ नहीं करेगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हक़ इमान के वास्ते खुदा के नाम पर फना&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हो जाओ। ैहक़ हलाल की कमाई कर।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रहम का इन्सान खजान बन, रहबर की&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;दरगाह में अपनी रूह को पहुंचा। हलाल की&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कमाई में से यतीम मोहताजों को खैरात कर।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रहम दिल इन्सान खुदा का प्यारा, बेरहम इन्सान&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खुदा का दुश्मन।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खुद को न जाना खुदा को क्या जाने ?&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हुस्न को हुस्न से मिला दे, रूह को&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नूर से जोड़ दे। तरो ताजा़ खुशनुमा&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;गिजा खा।&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(85, 0, 85); font-weight: bold;"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(85, 0, 85); font-weight: bold;"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 170);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अपना साधन (गतांक से आगे)&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;गुरू की आंखों की पुतली को देखते-देखते जब अन्तर्जगत के नजारे दिखाई दिए तो मुझमें जबरदस्त मस्ती आ गई। गुरू ने अपनी आंखें बन्द कर लीं तो मैंने भी अपनी आंखें बन्द कर लीं तो देखता हूं कि उसी तरह के दृश्य देख रहा हूं और मैं अनुभव करता हूं कि बहुत से लोग उन्हीं किरणों पर आते और जाते हैं। आना और जाना होता है। इच्छा हुई कि देखूं कि कहां जाते हैं। एक तख्त सुन्दर है जिस पर सुरतें लिंग आकार में चढ़ती हैं। मालूम होता है कि डोरियां लगीं हैं। उनको कोई खिंचता है और कुछ शक्लें भयानक मालूम होती हैं जो कि सुरतों के साथ जा रही हैं। हिसाब हुआ और फिर फैलाव उन्हीं डोरियों का होता है। उन्हीं पर सुरतें उतारी जाती हैं। कुछ दूर जाने पर अन्धकार लोक आता है जहां पर असहनीय बदबू हैं। और भी बहुत से दृश्य दिखाई पड़े। गुरू महाराज ने आवाज दी कि ‘आंख खोलो’’ मालूम हुआ कि गुरूजी ने अन्तर ही में कहा और गुरू सामने खड़े हो गए। आंखे खोलते ही मालूम हुआ कि जो मैं बाहर की चीजें देखता हूं इनमें गर्मी है और यहां अच्छा नहीं लगता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;कुछ देर बाद मैं पेशाब करने गया तो अपने को अनुभव करता हूं कि मैं इस पृथ्वी पर चल ही नहीं रहा हूं और बदन में इस कदर स्फूर्ती है कि सालों दिन और रात काम करूं पर थकान का नाम नहीं। गुरू महाराज ने पूछा कि ‘‘अब गुरू की दया समझ में आई ?’ इसीलिए लोग गुरू के पास दौड़ते रहते हैं। आम लोगों को गुरू की इस दया का आभास नहीं होता है। जिनके दिल गुरू के हृदय से मिलना चाहते हैं गुरू उन्हीं के ऊपर दया करते हैं। आज हमारे स्वामी जी महाराज ने अपार दया हमारे ऊपर की है और गुरू महाराज ने समझाया कि ‘‘इसी दया को देने के लिए गुरू बार-बार सत्संग में बुलाते हैं और अपना दर्शन देते हैं और कहते हैं कि तुम अपनी अपवित्र आंखों से हमारी पवित्र आंखें देखो तो तुम्हारी धुलाई मैं कर दूंगा।’’&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;धन्य-धन्य गुरू! अनेकों बार गुरू धन्य। तुम्हारी महिमा अकथ है, अगोचर है, वर्णन कोई नहीं कर सकता। अल्पज्ञ जीवों पर तुम्हीं दया करते हो। तुम्हारी रहनुमाई में महासुख है। तुम्हीं आनन्द के भण्डार हो, तुम्हारी कृपा मात्र से जीव अनेकों युगों के पापकर्म से मुक्त हो जाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मैं गुरू की मोहनी मूरत देखता ही रह गया। इसी स्वरूपों में भगवान आया करता है। लोग भगवान को पहचान नहीं पाते हैं। ऐसे भगवान सदा आते रहे जो इन्हीं शक्तियों में आते हैं। गुरू बोले- ‘बैठ! साधन और मेहनत के साथ करो। गुरू तुम पर खुश है और तुम जैसे-जैसे साधन बढ़ाओगे वैसे ही तुम्हारी तरक्की होगी।’’

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1259</link><pubDate>Mon, 30 Jan 2012 10:50:58 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आज बाबा जयगुरूदेव जी महाराज अपने काफिले के साथ हैदराबाद में हैं। सत्संग दोपहर में साढ़े बारह बजे हुआ और बाबाजी ने नामदान भी लोगों को दिया। काफी लोग हर तबके के आए और कुछ लोग बाबाजी से अलग से भी मिले।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने कहा कि यह जिस्म, शरीर एक किराये का मकान है। अनेकों के जन्मों के शुभ कर्मों से आपने इसे पाया है। मनुष्य शरीर बर्तन को मालिक ने पवित्र, पाक-साफ दिया। दुनियां की अनेक गन्दी ख्वाहिशों ने इस जिस्म को गन्दा कर दिया है। आप अकेले आए और अकेले जाना है। संसार की इच्छाओं में क्यों फंसे पड़े हो? कितने लोग आए और निराश होकर चले गए। तुमको भी जाना है, अफसोस करते हुए। मरघट पर ज्ञान होगा, शमशान का इल्म होगा। सोचो फिर क्या काम आएगा?&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जाते समय लोग तुम्हारा निरादर करेंगे। हाड़-मांस की चमड़ी में जितनी कूदाफांदी करते हो। कर्मों का फल भोगना पड़ेगा। किए पर पछताना होगा। कुदरत से टक्कर मत लो, वो कितनों को चकनाचूर करती है। अहंकारियों के अहंकार को कुदरत ही ठीक करती है। इल्म के आदमी से बेइल्म इन्सान अच्छा है। जो गुनाहों से डरता है खुदा उसपर रहम करता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(85, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बाबाजी की भूली-बिसरी बातें&lt;/span&gt;&lt;br style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;span style="color: rgb(85, 0, 85);"&gt;&amp;nbsp;अपना साधन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब मैं गुरू के पास पहुंचा तो कार्तिक का महीना था, जाड़ा प्रारम्भ हो रहा था। गुरू महाराज ने दर्शन देते ही मुझे उपदेश दे दिया था। मैंने उनकी आज्ञा लेकर साधन प्रारम्भ कर दिया। जिस दिन से साधन शुरू किया उसी दिन से चित्त की चंचलता अधिक शुरू हो गई। परन्तु गुरू से अर्ज करता रहता था कि मेरा चित्त स्थिर नहीं रहता है, वक्त साधन के भागता रहता है। गुरू समझाते थे कि साधन के समय तुम हमारे रूप का दर्शन कर लिया करो और जब मन न माने तो रोया करो।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब साधन में चित्त, मन और इन्द्रियां चलायमान हो जाती थीं&amp;nbsp; तो मैं गुरू के देह स्वरूप आकार को ध्यान में लाता था। जब गुरू का आकार सामने आता था तो उस वक्त मन, चित्त रूक जाया करता था और किसी जगह नहीं भागता था।जब चित्त, मन एक जगह रूक गया तो भजन करते समय शब्द घण्टा, शंख और ऊपर की धुन सुनाई पड़ती थी। धुन सुनने में बहुत आनन्द आता था। मालूम होता था कि मैं गर्मी से सर्दी में आ गया हूं और यह सर्दी अधिक शीतलता देने वाली है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मुझे अनुभव हुआ है। जब इच्छा जगी मालूम हुआ कि घास के ढेर में आग लगा दी है और अग्नि प्रचण्ड धारण कर चुकी है। इसी तरह एक झांेका था। मैं पास ही में था फिर गुरू के पास पहुंच गया। गुरू ने अन्तर भाव से देखा। उसी तरह समझाया और कहा कि-तुम हमारे पास रहो और साधन करो। बाहर मत कहीं जाओ। कुछ दिन बाद यह अंग जो विकारी प्रकट हुआ है खत्म हो जाएगा। गुरू की कृपा लेकर और पास रहकर साधन में लग गया। कुछ दिन बाद इन्द्रियों का अंग चला गया और गुरू बहुत प्रिय सत्संगी हितकर मालूम होने लगे। अन्तर में लगातार भजन करने की इच्छा जाग गई और मैं साधन में लग गया। साधन करते वक्त जो पर्दा आ गया था और चंचलता बढ़ गई थी, मन, चित्त, बुद्धि मलीन हो गए थे वह साफ होने लगे।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;साधन समय में प्रकाश साफ फिर होने लगा और कुछ-कुछ आवाजें सुनाई देने लगीं। मालूम होता है कि आवाज से मकान गूंजने लगा और आवाज सुनकर बहुत अच्छा लगता है। एक दिन मैं एक सत्संगी के यहां गया जो कि थोड़े दिनों से सत्संगी हुआ है। इसके पूर्व में वह सत्संग मांस शराब, अनाचार करता था। परन्तु सत्संग में आकर उसने मांस-शराब पीना त्याग दिया। अपने घर बुलाकर भाव के सहित भोजन कराया। जैसे ही भोजन किया कि चित्त, मन, बुद्धि खराब हो गई। अगर गुरू के पास न पहुंचता तो निसंदेह मैं बह जाता। गुरू के समीप पहुंचते ही गुरू ने मीठे स्वर से शब्द उच्चारण किए।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;किसी सत्संगी के यहां संकोच में भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि एकाएक उसके कर्म नष्ट नहीं होते हैं। सत्संग में शरीक किया है अब उसका इलाज कर्म काटने का होगा।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;गुरू महाराज ने कहा कि आज तुम्हारा मन बहुत खराब है। तुम आंखें बन्द करो। जब मैंने गुरू आज्ञा से आंखें बन्द की तो मुझे अन्धेरा मालूम हुआ और थोड़ी देर बाद मैं भजन पर बैठा तो मालूम हुआ कि शब्द कभी सुना ही नहीं है। दोनों दयाओं से मैं खाली रह गया। मुझे बड़ा अफसोस हुआ कि मैंने अपना पैदा किया हुआ धन खो दिया। इसी सोच-विचार में गुरू के सामने रोने लगा। गुरू ने दुखी अवस्था देखकर कहा कि ऐसी गलती अब न करना और हर एक किसी के यहां भोजन मत करना। तुम यहां आओ। मैं गुरू के निकट पहुंचा और अपना सिर चरणों में रख दिया। गुरू महाराज ने अपने हाथों से मुझे उठाया और कहा कि हमारी आंखों की ओर अपनी आंखों से देखो। मैंने अपनी आंखों को गुरू की आंखों के साथ जोड़ दिया और एक टक से गुरू की आंखों की पुतली को देखने लगा। जब मेरा पूरा भाव सहित गुरू की पुतली पर दृष्टि गई तो देखता हूं कि गोलाकार एक बहुत भारी प्रकाश आ गया जो कि बहुत बड़े आनन्द का अनुभव कराता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;जब मैंने गुरू की पुतली में होकर उसी गोलाकार प्रकाश में होकर देखा तो मुझे खुला हुआ आकाश मालूम हुआ ओर जिसमें मालूम होता था कि सड़क बनी है, सड़क के किनारे बाग लगे हैं। उसके बीच मेंसुन्दर मकान है, कुछ पुरूष और स्त्री नजर आते हैं। बगीचों में सुन्दर एक कतार में फूल हैं और सुगन्धी से मैं मस्त हो गया। ऐसा मालूम हुआ कि मैं किसी दूसरी दुनियां में पहुंच गया हूं। गुरू की पुतली में मालूम हुआ कि एक विशाल ज्योति जल रही है जिसमें आकार है और उसी ज्योति की किरणें समूचे ब्रह्माण्ड को अपनी कशिश में लपेटे हुए हैं और उन्हीं किरणों पर यह जगत सरसब्ज है। एक जरह की जबरदस्त मस्ती आ गई है और विकारी अंग दूर हो गया।-क्रमशः

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1258</link><pubDate>Sun, 29 Jan 2012 09:54:10 GMT</pubDate></item><item><title>जयगुरूदेव समाचार</title><description>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आजद प्रातः ओमनाबाद (कर्नाटक) में सत्संग के पश्चात बाबा जयगुरूदेव जी महाराज अपने विशाल काफिले के साथ दौपहर बाद हैदराबाद पहुंच गए जहां भारी जनसमूह ने बाबाजी व काफिले का बैण्ड-बाजे के साथ स्वागत किया। प्राप्त सूचना के अनुसार हैदराबाद में कल से जगह-जगह सत्संग का आयोजन किया जा रहा है। काफिले का जहां-जहां पड़ाव होगा उसी स्थान पर सत्संग भी होगा। चर्चा है कि सभी वर्गों, जातियों के लोगों कि भारी उपस्थिति होने की संभावना है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;बाबाजी ने सत्संग में कहा कि शरीर में गन्दगी हो जाए तो नहाने से साफ हो जाती है। इसी प्रकार जीवात्मा जो दोनों आंखों के पीछे बैठी है युगों-युगों की गन्दगी इसके ऊपर जमा हो गई। नतीजा यह हुआ कि जीवात्मा की आंख (तीसरी आंख) और कान बन्द हो गए। अनेक जन्मों का कूड़ा-कचड़ा जब जमा हो गया तो अब महात्माओं से युक्ति लेकर जब भजन-ध्यान, किया जाएगा तब गन्दगी साफ होगी।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;इस काम में मन की बड़ी रूकावट है। मन को रोककर जब साधना की जाएगी तभी काम बनेगा। दोनों आंखों के बीच से ऊपर के दिव्य मण्डलों में जाने का रास्ता है। महात्मा मिलें और उनसे रास्ता लेकर साधना जब की जाए तब जीवात्मा होश में आती है। ऊपर में मालिक बैठा है उसके दर्शन-दीदार होंगे। ऊपर में बड़े-बड़े लोक हैं-स्वर्ग, बैकुण्ठ हैं, शक्तिलोक हैं ईश्वरधाम है, ब्रह्मधाम आदि अनेक रूहानी मण्डल हैं जहां ईश्वर, खुदा, गाॅड बैठे हैं उनका दर्शन-दीदार करो। यहां तो रहना नहीं। अपना-अपना समय गुजार लो फिर यहां से चलना है। जब भजन करोगे, ध्यान करोगे तब दिखाई-सुनाई पड़ेगा। ये पराविद्या है, योगविद्या है। इसकी पढ़ाई की जाती है तब काम बनता है। संतों की खोज करो। चुप रहोगे तो वह परमात्मा कभी नहीं मिलेगा। इसलिए तलाश करना जरूरी है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;इतने बड़े देश भारत में लोकतंत्र सफल नहीं रहा। रक्षक ही भक्षक हो गए तब तो जनता ठन-ठन गोपाल रह जाएगी। जनता में जगह-जगह आवाज उठ चुकी है कि इस लोकतंत्र से अच्छा तो राजतंत्र था।

&lt;/span&gt;</description><link>http://jaigurudevworld.org/jaigurudevworld/info/JgdDiary.aspx?id=1257</link><pubDate>Sat, 28 Jan 2012 09:49:54 GMT</pubDate></item></channel></rss>
